
सड़क किनारे की चाय सुकून ए राहत सी होती है !
छोड़कर फिक्र मंजिल की तरबीयत भी ताक पे होती है !
राह हो जश्न ए शमा की या तन्हाई कोई बेपरवाह सी !
वफा ए सुकून की हिदायत सिफ्त ए खास सी होती है !
पूछना कितनी चीनी या कड़क अदरक मिज़ाज स्वाद की झींनी चुस्की वाह या बेकार सी होती है !
होता दर असल ये है कि कसूर होता नही चाय का बनाने वाले वो हाथ की चस्क की चाह से होती है!
बहुत बार होता है ढूँढता रहता है माँ सा स्वाद पर बात वो राज ए खास कहां ही जज़्बात की होती है !
तुम पियो चाय सड़क पर क्यूंकि घर मे रही नही वो बात बात की बात मे बात जो चाय के बाद फिर होती है !
देस परदेस की बातें या चर्चा ब्रह्म ब्रह्मांड हर ज्ञान की बात वहां बड़ी आम सी होती है !
हैं न भाग्य शाली वो जगह किनारें वाली जो रहती तो वहीं की वही हैं पर बात हकदार की होती है।।
चल सरल पिलाओ चाय बैठ टपरी सड़क के आली !
क्यूंकि बेली नही कोई तेरा जिससे कोई बात ही होती है !
संदीप शर्मा सरल!!
देहरादून उत्तराखंड!!













