
पहली बारिश मे रंग उतर जाते है
छदम पौश दुनियाँ के नकाब हट जाते है
दावे तो बहुत होते है असलियत तो सामने आ ही जाते है
पहली बारिश मे रंग उतर जाते है
विकास के बड़े बड़े वादे होते है
खोखले झूठे सिर्फ दावे होते है
शहर के शहर अघोषित समंदर बन जाते है
नदी नालों से सर्वत्र घर भर जाते है
विनाश ही विनाश चऊं ओर नज़र आता है
जिम्मेदारों का दूर तलक नही कोई शोर आता है
सफेदपोशों के फलसफे मे ही हम फँस जाते है
पहली बारिश मे रंग उतर जाते है
मक्कारी घूंसखोरी हर ओर है
किसी का ना किसी पर जोर है
मन के मालिक ये जिम्मेदारों का अपना राज है
कागजों मे दिखता हकीकत मे चौपट काज है
विनाश पर ही विकास का झूठा रंग चड़ जाते है
पहली बारिश मे रंग उतर जाते है
ईमान अपना पैसे से बेच खाए है
भौतिकतावाद मे खुद को खपायें है
आम आदमी के दुखों से नही इनको कोई सरोकार है
इनके लिये पैसे के आगे सब उठ बेकार है
कर्मठता अपनी सिर्फ कागजों पर ही दिखाते है
पहली बारिश मे रंग उतर जाते है
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र










