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तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं

तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं

तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ,
मंज़िल की मुझको चाह नहीं, बस चलते रहने का आदी हूँ।
आराम से मेरा रिश्ता कैसा, घड़ी के सुई की भाँति हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

काँटों की परवाह नहीं मुझको, मैंने फूलों को ठुकराया है,
पुष्प-पथ की मुझको चाह नहीं, अंगारों से पथ सजाया है।
मुश्किल जितनी बढ़ती जाए, उतना लड़ने का आदी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

अवरोध नहीं जब जीवन में, तो जीना भी क्या जीना है,
संघर्षों से जो डरा नहीं, आखिर बनता वही नगीना है।
गिरकर फिर से उठ जाता हूं, मैं खुद में एक उपाधि हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

पतवार के बल पर सभी यहाँ, नाव साहिल तक लाते हैं,
मैं बिन पतवार सागर की, लहरों में चलने का आदी हूँ।
रुकना मेरी फितरत नहीं, मैं लहरों का अनादी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

पाया नहीं कुछ जीवन में, तो खोने का भी ख़ौफ़ नहीं,
फ़क़ीराना अंदाज़ है मेरा, बस अपनी धुन में रहता हूँ।
अपनों का क्या, गैरों का भी मैं दर्द बाँटने का आदी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

रोक सके कदमों को मेरे, ऐसी बाधा बनी नहीं,
वक़्त की छाती चीर-चीरकर, अपनी तक़दीर लिखता हूँ।
झुकना मेरी फितरत नहीं, मैं स्वाभिमान का फरियादी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

ठुकराने का कोई ग़म नहीं, अपनाने का कोई हर्ष नहीं,
मशाल थामकर बढ़ता जाता, मैं परिवर्तन की क्रांति हूँ।
झूठ की चौखट पर जाकर, सिर न धरने का आदी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

छाती में शोले भरकर मैं, चट्टानों पर बढ़ता जाता हूँ,
तेवर तो मेरे गरम मगर,दिल कोमल,नवल फरियादी हूँ।
रुकना मेरी रीत नहीं, हर पल बढ़ने का आदी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

हार-जीत का मोह नहीं, बस कर्म-पथ पर चलता हूँ,
मिट जाना मेरी हार नहीं, मिटकर फिर मैं खिल जाता हूँ।
अन्यायों की हर चौखट का, मैं जन्मों से प्रतिवादी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

जीवन क्षणभंगुर जानकर, श्वासों से मुझको प्रेम नहीं,
कालचक्र की आँखों में भी, आँख मिलाकर आता हूँ।
काल भी मुझसे हार गया, मैं साहस का अपराधी हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

श्मशान से प्रेम है मुझको, पल-पल मृत्यु अपनाता हूँ,
राख नहीं, हर चिता से मैं जीवन का अर्थ उठाता हूँ।
मन मेरा निर्विकार रहे, भीतर से गहरी समाधि हूँ।
तूफ़ानों से मुझको बैर नहीं, मैं उसका सहचर,साथी हूँ।

रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड

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