
जरा थम के बरसना ये सावन, कुछ यादें सँवरना बाकी हैं।
मन की सूनी इस चौखट पर, प्रीत – बूँदों का उतरना बाकी है॥
जब भी तेरी रिमझिम बरसे, मन आशाओं से भरता है।
नयन-कोर में ठहरे सपनों का, चुपके से निखरना बाकी है॥
माटी की सौंधी खुशबू में, आँचल जब मेरा महक उठता।
भीगी पुरवा के झोंकों में, उसका फिर से बिखरना बाकी है॥
सूनी अमराई पूछ रही, झूलों में प्रेम कब गाएगा।
फूलों की महकती डाली में, फिर से बहकना बाकी है॥
समय बहा ले गया बहुत कुछ, फिर भी आस नहीं टूटी है, अभी।
बिखरे रिश्तों की डोरों को, नये शिरे से जुड़ना बाकी है॥
बरगद वाली चौपाल के किस्से अब भी यादों में रहते हैं।
धूल भरे उन पन्नों पर, यादों का संवरना बाकी है॥
भीगी राहें हैं दूर तलक ,पैरों को संभलकर चलना है।
भीगें मौसम की बाहों में, उस संग सिमटना बाकी है॥
फिर जी भरके बरसना ये सावन, धरा संग प्रीत निभा लेना।
इस धड़कते हुए मन को बस, थोड़ा और सँभलना बाकी है॥
जरा थम के बरसना ये सावन, कुछ यादें सँवरना बाकी हैं।
मन की सूनी इस चौखट पर, प्रीत बन बूँदों का उतरना बाकी है॥
पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद












