
कोई नहीं जानता है मेरे दिल के ज़ख्मों को,
आज भी मेरे दिल पर गहरे निशान हैं ,
तुमने कहा था कि साथ चले हैं और साथ चलेंगे
मगर प्यार भरा तेरा साथ मुझे कहिं भी
नज़र नहीं आता,
अंधेरों में दूर-दूर तक उजाले कहिं भी
नज़र नहीं आते,
रोशनी का
दूर दूर तक, नामों निशान नहीं यहां
दूर तक
दियों की कतारें लगी रहीं हैं कभी
प्यार के दीपक की लो। अब
हम कहां जगमगायें ,
हे खुदा इन बेवफा हसीनों से बचा कर रखना,
हम अब कहां किसका दरवाजा खटखटाएं।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)










