
हे महाकाल ! तेरी धरा पर ये कैसा है भूचाल।
मानव ही मानव को डसे ये कैसे काल की चाल।
हे शिव शंकर चहुं दिस तेरी धरा पे विचरें व्याल।
तेरी सृष्टि आसुरी तांडव से है बेहाल इसे संभाल।
कलिकाल की ये हुंकार खंडित विश्वास आधार।
भविष्य की चिंता में डूबा मानव कैसे उतरे पार।
वाणी पे मृदु आवरण, कुटिल स्वार्थ से सरोबार।
दूषित हो रहे संस्कार, हवा चली बढे व्यभिचार।
धर्म में कुछ ऐसे लोगों का बढ चला अधिकार।
धर्म-कर्म से लेना-देना नहीं, बना धर्म व्यापार।
चिकित्सा ज्ञान था अंग धर्म अब पड़ा मझधार।
शिक्षा का मूल्य गिरा,अब खुले पैसे के व्यापार।
वोट की राजनीति से हो चला जनजीवन भ्रष्ट।
युवा प्रोढ वरिष्ठ सर्व,काल की चाल से हुए त्रस्त
चहुं दिस बहरूपियों की भरमार धरा लाचार।
ताना-बाना बिखर गया, ज्यूं भवसागर में ज्वार।
क्या डमरू बजे धरा,रातें काली कब होवे सवेर।
‘सत्य मेव जयते’ दबा राख के ढेर, है कैसी देर।
कालों के काल हे महाकाल ! कैसा ये महाजाल।
क्यूं धर्म चला पाताल, धरा ले अब तूं संभाल।
महेश शर्मा - करनाल










