
विधा – ग़ज़ल
ज़ुस्तुज़ूं कुछ रह गयी जिन्दगी-ए-तमाम मे कसर अधुरी रह गयी इश्क-ए-मुकाम मे
दिल-ए-एतबार कर ना सके जहाँ ने झुका दिया राहे-ए-मुकाम मे
ज़ुस्तुज़ूं कुछ रह गयी जिन्दगी-ए-तमाम मे
आगे बढने का हौसला तस्लीम नही था
साथ उसके पे यकीं नही था अकेले रह जाने का सवब एक मुस्तकीं था
दस्तूर जमाने का देखो साब तन्हाई के बेसाख्ता तन्हा जमीन था
कुछ हासिल ना कर सके मौसम-ए-इन्तेक़ाम्ं मे ज़ुस्तुज़ूं कुछ रह गयी इस जिन्दगी-ए-तमाम मे
ज़िंदगी गुजर गयी रुखसत हुए उसको बेजार हो गयी जिन्दगी कोन्सें किस्मत को
पल अब कटता नही रातें भारी हो गयी मस्मत को
खोखले मंजर को सिमट गयी रूह अपनी
इंतजार खत्म उम्मीद बेमानी थी उसकों क्या कहे रवायतों मे कहां वो तूफानी थी सिमट के रहे गये इश्क-ए-नाकाम मे
ज़ुस्तुज़ू कुछ रह गयी इस जिन्दगी-ए-तमाम मे
ख्वाहिशें हवा हो गयी इस पतझड़ मे
उलझ गये मौसम के अंधड़ मे कहाँ कुछ बाकी था इस नाकाम-ए-जिन्दगी मे बरस गये सावन बनके लोगो की भेड़ मे
बेमकसद जिन्दगी का सफर है बेकाम मे जुस्तजू कुछ रह गयी इस जिन्दगी-ए-तमाम मे,,,,,
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











