
पहली बार गज़ल पर एक गज़ल लिख रहा हूँ
गुस्ताखी माफ हो पर कर रहा हूँ
नज़रे उठती नही गर नज़रें मिलती नही
क्या कहूँ तेरे नूर-ए-कशिश पर
दीदार जो होता है धड़कनो का बयार रूक सा नही रहा है
तेरे सितम पर ए मेरे सनम मन से बावरा सा हो रहा हूँ
पहली बार गज़ल पर एक गज़ल लिख रहा हूँ
तेरी अदायें मुझे दुनियाँ से जुदा लगती है
तेरी आवाज की सरलता कोयल से मधुर लगती है
तेरी मुस्कुराहट संगीत के सुरों से भी प्यारी होती है
झुके नयनों मे सारे जहां के हुस्न की खुमारी होती है
इसी खुमारी पर एक कलाम लिख रहा हूँ
बाखुदा पहली बार गज़ल पर एक गज़ल लिख रहा हूँ
प्यार पर तेरे ही अन्दाज़ अपना शायराना सा है
तेरा दिखना उस पर एक नज़राना सा है
मौसम की मदहौशी भी कहर से कुछ कम नही होती
चिन्गारी को आग बनते देर नही लगती
भड़कते मौसम मे तेरा सुर्ख चेहरा अन्दाज़-ए-मोहब्वत की अदावत सी लगती है
संगीत के सुरों की खनकती झंकार सी लगती है
इसी झंकार पर अपने दिल से प्यार का पैगाम लिख रहा हूँ
पहली बार गज़ल पर एक गज़ल लिख रहा हूँ
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













