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प्रश्न…


यह तिमिर गहरा घना ..
क्या जीत पायेगा इसे
जलता हुआ नन्हा दिया ?

दर्प के आकाश पर
बैठा हुआ यह अंध है ..
बढ रहा है राज्य इसका
रौशनी के द्वार सारे बंद है .

झूठ के इस व्यूह को
अभिमन्यु का साहस कभी
क्या तोड़ पाएगा भला ?

कुछ ‘ बड़ो’ की पक्षपाती
नीतियों की ये कथा ..
सत्य बैठा सिर झुकाए
मौन है सारी सभा ..

भूमिका से भीष्म की
मायूस होती द्रोपदी
किससे कहे अपनी व्यथा ?

धर्म का यह युद्ध अब
हारा हुआ लगने लगा ..
शक्ति का सामर्थ्य का
उत्साह भी चुकने लगा ..

अन्याय का प्रतिरोध
करने न्याय की स्थापना ..
कब कृष्ण आएगा यहाँ …?

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