
वह सुबह कभी न आएगी
ये रैन न अब कट पायेगी
आज विभ्रम की बेला में
जीवन सन्ध्या ढल जायेगी
मंझधार हमारे भीतर है
मझधार हमारे बाहर है
हम डूब रहे है बार बार
साँसों तक उफना सागर है
चटकीले रिश्तों का सारा
रंग उतर गया है पल भर में
मन लिपटा क्यों उन शाखों से
जिन पर काँटे है पतझर है
तृष्णा रोकर रह जायेगी
खोया वापस न पायेगी
चेहरों के पथरीले पन में
अपना पन ढूंढ न पायेगी
चन्दा नभ की देहरी जागे
माथे दीपों का सेहरा है
केवल अंधे अंधियारे का
मेरी रातों पर पहरा है
मरघट सा सन्नाटा अब तो
आमन्त्रण देता है मुझको
थक गयी अभागी हर सिसकी
वह भाग्य देवता बहरा है
गागर रीती रह जायेगी
पर प्यास तो बढ़ती जायेगी
भावुकता सूखी नदी हुयी
टुकड़े टुकड़े बंट जायेगी
हम मूक सहा करते है सब
हर कोई पीड़ा देता है
सर्वस्व छीन करके मेरा
वह क्रूर विधाता हँसता है
हर रोज डूब जाता सूरज
विश्वासों की अर्थी लेकर
गहरे घावों की टीस लिए
ये जन्म सर्प सा डसता है
पगडंडी क्या मुड़ पायेगी
पारस मणि तो खो जायेगी
जो कफ़न ओढ़ कर सोती है
वो आस न अब जी पायेगी |
कुलदीप वर्मा











