
मैं कौन हूँ, क्यों हूँ, क्या हूँ – यह प्रश्न लिए चलता हूँ,
भीड़ में रहते हुए भी, हर पल खुद से मिलता हूँ।
मैं देह हूँ या चेतन हूँ, आत्मा हूँ या अनजान,
मिट्टी का एक कण हूँ, या अनंत आसमान?
जो दिखाई देता है, क्या उतना ही मेरा संसार है,
या मेरे भीतर छिपा कोई अनंत विस्तार है?
मैं साँसों की धुन हूँ, या समय का एक पड़ाव,
जीवन की कोई राह हूँ, या मंज़िल का ठहराव?
मैं हँसी में छिपा आँसू हूँ, या आँसू में मुस्कान,
मैं किसी प्रश्न का उत्तर हूँ, या स्वयं एक प्रश्न महान?
जो पाया, वह मेरा कितना; जो खोया, उसका क्या मोल?
हर उत्तर के पीछे क्यों जन्म लेता है एक नया सवाल अनमोल?
मैं रिश्तों का प्रतिबिंब हूँ, या अपने मन की पहचान,
मैं कर्मों से बनता हूँ, या भाग्य लिखता मेरा विधान?
जब मौन मुझे घेरता है, तब भीतर कौन बोलता है?
जब सब कुछ छूट जाता है, तब क्या सचमुच कुछ खोता है?
शायद मैं खोज नहीं, खोज की एक राह हूँ,
शायद मैं मंज़िल नहीं, निरंतर बहता प्रवाह हूँ।
शायद मैं बीते कल की कोई निशानी हूँ,
शायद आने वाले कल की कोई कहानी हूँ।
मैं क्या हूँ, क्यों हूँ, कौन हूँ – उत्तर अब भी अधूरा है,
पर स्वयं को जानने का सफ़र ही शायद जीवन का अर्थ पूरा है।
और जब स्वयं से मिलूँगा, शायद तब समझ पाऊँगा,
जिस सत्य को बाहर खोजता रहा,
वह मेरे भीतर ही कहीं मुस्कुरा रहा था।
वह चेतना है,
जो दिखाई नहीं देती, फिर भी सब कुछ देखती है;
जो बोलती नहीं, फिर भी भीतर निरंतर कुछ कहती है।
न उसका कोई आकार है, न उसकी कोई सीमा,
वह समय से परे है, फिर भी हर क्षण मेरे भीतर जीवित है।
शायद मैं वही नहीं, जो स्वयं को समझता आया हूँ;
शायद मैं उस अनंत चेतना की एक क्षणिक अनुभूति हूँ,
जो अपने ही विस्तार में
निरंतर स्वयं को पहचान रही है।
मैं क्या हूँ? कौन हूँ? क्यों हूँ? कैसे हूँ?
शायद यही जीवन का सबसे गहरा प्रश्न है।
इस प्रश्न का उत्तर ‘मैं’ शायद कभी न जान पाऊँ,
पर मेरे भीतर का मौन चेतन जानता है।
और जब ‘मैं’ की सीमा मिटेगी,
तभी शायद सत्य दिखाई देगा,
मैं अनंत से अलग कोई अस्तित्व नहीं,
मैं उसी अनंत चेतना में
एक क्षणिक अनुभूति हूँ।
शायद जीवन का रहस्य किसी उत्तर में नहीं,
बल्कि उस प्रश्न में छिपा है,
जो हमें बार-बार,
अपने भीतर लौटाता रहता है।
रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार













