
दामिनी चमके मेघा गरजे,
झूम झूम के बहे पुरवाई!
रिमझिम रिमझिम बरसे सावन,
हर्षित मन पुलकित तन भाई!!
सावन की बहार है आई!
आम डाल पर पड़ गए झूले,
कजरी गीत मनोहर गूँजे!
जाग उठी देखो तरुणाई,
सावन की बहार है आई!!
नाचे मोर पपीहा गाए,
शीतल हरियाली चहुं छाई!
देख अलौकिक दृश्य प्रकृति का,
वसुधा ने भी ली अंगड़ाई!!
सावन की बहार है आई!
‘जिज्ञासु’ तन मन हर्षित हो,
एक-दूजे को गले लगाई !
गूँज उठी चहुंदिश शहनाई,
सावन की बहार है आई!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













