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शामें ढलने लगी पर तुम्हें

शामें ढलने लगी पर तुम्हें
कुछ ख़बर नहीं
चर्चा हुईं तमाम पर तुम्हें कुछ ख़बर नही

लग गईं बाज़ार में रिश्तों की राखियाँ
घटते है रोज़ दाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं

अमन चैन मुल्क का हो रहा नीलाम
टकरा रहे हैं जाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं

जिस्मों की हो रही दलाली
नर्क के हैं हम्माम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं

मज़हब के नाम पर दिखा जोश-ओ-जुनून ही
होते हैं क़त्ल-ए-आम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं ।।।।।

के वी

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