
काफिया —-ऊल की बंदिश
रदीफ—- पाओगे।
बहर— 1222—1222—1222—1222=28
नज़र में प्रेम रखकर तुम हृदय से फूल पाओगे,
मिटाकर द्वेष मन से जिंदगी में कूल पाओगे।
अहं की धूल आँखों पर अगर हरदम बिछाओगे,
न जीवन कासही तुम फिर कभी भी मूल पाओगे।
करो उपकार जग में प्यार का दीपक जलाते चल,
यही दौलत रहेगी और क्या ले भूल पाओगे।
कभी यदि शूल चुभ जाए सफर आधा न छोड़ो तुम,
सहन कर पीर मंजिल पा खुशी अनुकूल पाओगे।
सुरभि जीवन मिला इसमें सदा शुभ कर्म ही करना,
करोगे वंदना प्रभु की नहीं प्रतिकूल पाओगे।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार











