
शब्दों की भीड़ नहीं है, मेरे पास सच्चाई है,
मैं सागर जैसा हूँ, इसलिए हर नदी समाई है।
उपदेश नहीं देता, खुद उस राह पर चलता हूँ,
किताबें नहीं पढ़ता, मेरे सीने में गीता है।
दिखावा करना आता नहीं, जो हूँ वही दिखता हूँ,
झूठ से दूर रहता हूँ, सच के साथ जीता हूँ।
कोई गुरु नहीं मेरा, अनुभव ही सिखाता है,
हर सवाल का जवाब, मेरे काम में बसा है।
भीड़ के साथ नहीं चलता, अकेला चलना पसंद है,
मान से जीना आता है, झुककर जीना बंद है।
नाम बड़ा नहीं चाहिए, काम बड़ा होना चाहिए,
जो समझे वही अपना है, बाकी से क्या लेना-देना।
माथे पर तिलक है, आंखों में जिद है,
टूट कर बिखर जाऊं, इतना कमजोर नहीं हूँ मैं।
जलो तुम जितना जलना है, अपनी जलन में,
मैं चिंगारी हूँ भाई, राख बनने की आदत नहीं है।
लोग पूछते हैं, इतनी ताकत कहाँ से लाता है,
मैं कहता हूँ सीधा, मेरे पास गीता है।
धर्म भी है, कर्म भी है, और इंसानियत भी है,
इसलिए सर उठाकर चलता हूँ, क्योंकि मेरे पास गीता है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













