
मेरा मन
तरस – तरस गया रे बरसात में,
मेरे नयन बरस रहें हैं सारी रात से,
मुझे मत बहला मिठी – मिठी बात से।
तपती गर्मी में भी न तपी ऐसे मैं,
ऐसा तप रही हुं मैं भरी बरसात में,
यह भी जाए सावन सुखा सुखा मेरे हाथ से,
आ भी जाओ मोहे मत तड़फाओ पिया बरसात है ,
मुझे ना बहलाओ,
बेकार के सवालात से,
यह सावन भी जाए सुखा सुखा मेरे हाथ से ।
विरहा की रात रुलाने लगी है मुझे ,
बेरी यौवन पे जोबन छाया,
जो छाऐ बादल बरसात के।
यह भी जाए सावन सुखा। सुखा बरसात में ।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)













