
बारिश की बूँदें अब आयीं
फूल पत्तियाँ सब मुस्काईं
पशु पक्षी हैं शोर मचाते
जैसे मृदु स्वर में हैं गाते ।
झूम रही विटपों की डाली
चहुँदिश फैली है हरियाली
रिमझिम-रिमझिम बरसे बादल
मन है आज खुशी से पागल ।
पीहू पीहू पपीहा बोले
टर्र-टर्र कर दादुर मुँह खोले
कोयल कू कू कू कर गाए
मयूर मीठी तान सुनाए ।
तृप्त हो जाती प्यासी धरती
आनंद सबके दिल में भरती
टिप टिप करके बूँदें झरती
बारिश तपिश सृष्टि की हरती ।
कहें “त्रिपाठी” ऋतु मनभावन
श्रेष्ठ महीनों में है सावन
देखो धान खेत लहलहाए
कृषक हृदय फूला न समाए ।
पिया याद सावन में आए
मुझसे विरह सहा न जाए
यादों के इस वातायन से
झाँक झाँक कर मन बहलाए ।
नागेन्द्र त्रिपाठी
गाजियाबाद / वाराणसी
उत्तर प्रदेश













