
आज का आधुनिक युग न जाने कहाँ ले जा रहा है, आज का मानव भी आधुनिकता की भीड़ मे धंसा जा रहा है।
अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं, सच्चे इंसानों की पहचान नहीं बस उसे आगे बढ़ना है, चाहे वह सीढ़ी कैसी भी हो, आगे बढ़ने की होड़ से उसे लड़ना है।
मंजिल तक पहुंचते पहुँचते न जाने क्या क्या लूट गया,
वह आगे बढ़ता रहा अपने लोग अपना देश सब छूट गया।
एक दिन इस भीड़ से आगे निकलकर वह अकेला सब हो गया,
इस बढ़ती हुई आधुनिकता मे वह खो गया।
जब उसने मुड़ कर देखना चाहा तो,
आज उससे अपना देश अपने लोग और अपनों का साथ छूट गया।।
पूर्णपावन कृति
सरायपाली छत्तीसगढ़













