
विधा : पद्य
सृष्टि नहीं आराम हेतु ,
क्यूॅं ढूॅंढ़ते हो बिस्तर ।
चलते रहो उलते रहो ,
बिस्तर तो है दुष्कर ।।
घनी अंधेरी यह निशा ,
घनी गहरी यह नींद ।
जोश होश खो सोया ,
निशा न सम अरविंद ।।
ख्वाब में आराम नहीं ,
क्यूॅं ढूॅंढ़ते हो बिछौना ।
बिछौना तो है बौना ,
बनाता है आधे पौना ।।
कर्ता नहीं सुख करता ,
कर्ता नहीं करे आराम ।
कर्ता वही पूज्य होता ,
वही तो दर्शनीय धाम ।।
कर्ता को भाए नींद न ,
जगता नहीं बिछावन ।
जगता को राम भाता ,
बिस्तर लगता रावन ।।
बिस्तर है आलस देता ,
बिस्तर होता अय्यास ।
मंजिल उन्हें भाया नहीं ,
हुए जो बिस्तर दास ।।
निशा तो प्रकाशहीन ,
निशा अन्य के सहारे ।
लालटेन प्रकाश भाता ,
चन्द्र ले जब किनारे ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













