
जंजीरें थीं पैरों में, पर हौसले संघर्ष करते थे,
गोली की गूंज में, वंदे मातरम् स्वर गूंजते थे।
1857 की चिंगारी, 1947 तक ज्वाला बनी,
हर गली, हर खेत, हर सरहद पर कुर्बानी खड़ी।
न भगत का फंदा भूले, न गांधी का चरखा,
न झांसी रानी भूली, न बोस का ललकारा।
जेल की सलाखें गवाह हैं,
कोड़ों के निशान गवाह हैं,
कितनी माओं के लाल मिटे,
तब जाकर तिरंगा लहराया है।
कलम भी लड़ी, तलवार भी लड़ी,
भूखे पेट संघर्ष किये,
बच्चे, बूढ़े, औरतें सब कंधे से
कंधा मिला करके लड़े।
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”
तिलक की हुंकार थी,
“करो या मरो” की आवाज़
आज भी दीवारों पर दरकार थी।
आज जो सांस खुली हवा में ले रहे हैं,
ये कर्ज उन शहीदों का है जो
लौटकर नहीं आए।
खून से सींचा है इस मिट्टी को,
तब जाकर चमन खिला,
आदित्य सिर ऊंचा करके बोले,
भारत माँ का लाल मैं।
स्वतंत्रता भीख में नहीं मिली थी,
आदित्य ये हक़ संघर्ष कर लिया था।
और इस हक की रक्षा करना,
आज हम सबका फर्ज बना है।
जय हिंद! जय हिंद की सेना।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












