
भ्रमर दोहा छंद गीत
22 गुरु, 4 लघु
मीरा की वो भक्ति है, ढुंढे रे गोपाल।
आराध्या जो कृष्ण की, बेला(चंदन) सोहे भाल।।
माता से वो पूछती, सादी सी ये बात।
मेरा स्वामी(पति) कौन है, क्या मैं मानूं जात(कुल)।।
माँ बेटी को टालती, है तू छोटी बाल।
आराध्या जो कृष्ण की, बेला सोहे भाल।।
बेचैनी से थी भरी, पूछे बारंबार।
माता बोली स्नेह से, गोपाला है प्यार।।
गोविंदा के कंठ में, वैजन्ती है माल।
आराध्या जो कृष्ण की, बेला सोहे भाल।।
शोभा देखी माधवा, भूली सारा भान।
मीठी वीणा गूँजती, मेवाड़ी थी शान।।
ले के तारा-एक को, बीते देखो साल।
आराध्या जो कृष्ण की, बेला सोहे भाल।।
दीपिका मानवानी, गुजरात












