
आदरणीय दादा चन्द्र प्रकाश गुप्ता ‘चन्द्र’ बुंदेला जी की काव्यकृति ‘युग स्वर’ विविध भावधाराओं से सिंचित ऐसी सार्थक रचना है, जिसमें कवि की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक आस्था, आध्यात्मिक निष्ठा और सामाजिक सरोकार एक साथ मुखरित हुए हैं। कृति में सरस्वती-वंदना से आरम्भ होकर गुरु, माता-पिता, राष्ट्रनायकों, स्वतंत्रता-संग्राम, शिक्षा, युवा-चेतना, पर्यावरण, गंगा, जल, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा विज्ञान तक विषयों का व्यापक विस्तार दिखाई देता है।
कवि इतिहास को विस्मृति से बचाने वाली प्रेरणा मानते हैं। महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई तथा अन्य राष्ट्रनायकों के माध्यम से शौर्य, स्वाभिमान और त्याग की परंपरा को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने का प्रयत्न मिलता है। दूसरी ओर ‘युवा सोच’, शिक्षा, व्यसन-मुक्ति और सामाजिक विसंगतियों से संबंधित रचनाएँ उनकी जनपक्षधर दृष्टि को उजागर करती हैं।
आध्यात्मिक पक्ष में श्रीकृष्ण, श्रीराम, महादेव और शक्ति-आराधना के माध्यम से कर्म, मर्यादा, पुरुषार्थ तथा नारी-सम्मान जैसे जीवन-मूल्यों को स्वर मिला है। प्रकृति-संवेदना में गंगा की पीड़ा और पर्यावरणीय चिंता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विज्ञान के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी कृति को समकालीन बनाता है।
अतः ‘युग स्वर’ को केवल कविताओं का संकलन कहना उसके व्यापक प्रभाव को सीमित करना होगा। यह राष्ट्रप्रेम, संस्कृति, अध्यात्म, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना का समन्वित काव्य-संसार है, जिसमें चन्द्र प्रकाश गुप्ता ‘चन्द्र’ का साहित्यिक व्यक्तित्व एक सजग, संस्कारवान, ओजस्वी और उत्तरदायी रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
समीक्षा प्रयास :- पवनेश मिश्र छतरपुर मप्र (कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार)












