
अक्सर दम तोड़ते देखा है,
अपनी ही दहलीज़ पर दहलीज़ को।
रात के सन्नाटे में भी लोग
मुँह छुपाकर रोते हैं,
यहाँ दिन भी किसी सन्नाटे से कम थोड़े हैं।
तक़दीर भी कहाँ कमज़ोर है,
पत्थर पर लोगों के नाम लिखे हैं,
मगर वक़्त की एक चोट लगते ही
कितने नाम मिट जाते हैं।
यहाँ सरहदों की फ़िक्र किसे है,
कई सरहदें तो देश के अंदर ही हैं,
फ़ासले नक़्शों पर नहीं होते,
कुछ दीवारें दिलों के अंदर ही हैं।
रोटियाँ खूब सिक रही हैं सियासतदारों की,
मगर तवा बिल्कुल निर्दोष है।
आग किसने लगाई—ये सवाल बाकी है,
धुआँ तो हर तरफ़ बेदाग़ दिखता है।
अजीब दौर है
जहाँ सच बोलना भी सरहद पार करना है,
और ख़ामोश रहना भी
किसी सियासत का हिस्सा है।
आर एस लॉस्टम












