
प्यासी जमीं प्रेम के बादल से करती गुहार
गुहार सुन प्रेम के बादल उमड़ -घूमड़ बरसता
प्रेम का पावस रस से जमीं को तृप्त करता
रिमझिम- रिमझिम फुहार से जमीन को पावन -निर्मल कर प्यास बुझाता
बरसो रे मेघा! तुम खूब बरसो
मैं कई महीनो से हूं प्यासी
मेरी प्यास बुझाओ ना
तेरी बारिश की बूंदे खुशियां है लाती
सूखे नदीयो, नाले, सरोवर
सब तुम्हारी राह हैं तकते
सुंदर-सुभग जमीं को स्वर्ग बनाओ
हमारे जीवन में हरियाली लाओ
तुम्हारे बरसने से खेत -खलिहान खिल उठते हैं
किसानों का मन हर्षित हो उठता है
मैं हरी चुनरिया ओढ़ कर मंद- मंद मुस्काती हूं
पेड़ -पौधे को लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाओ
पशु -पक्षी भी पानी को है तरसते
अब तो बरसो प्यास बुझाओ
नन्हे -मुन्ने बच्चे बारिश में खूब भींगते,
बच्चों संग मस्ती करते
ओ मेघा! जमकर बरसो, झमाझम बरसो
वो प्रेम के बादल! सभी तुम्हारे बरसने का राह तक रहे
मानव जीवन को सुखी बना दो
डॉ मीना कुमारी परिहार












