
रस्ता देख रही है मुनिया कब आओगे घर पापा
खेल खिलौने गुड्डा गुड़िया कब लाओगे घर पापा
अम्मा गुमसुम हो जाती जब तस्वीरों में दिखते हो
अख़बारों में छपते लेकिन कब छाओगे घर पापा
स्कूलों में बस्ता लेकर रोज़ रोज़ मैं जाती हूँ
जब आओगे तो मुझको भी क्या पाओगे घर पापा
भैया भी है बहुत रुआँसा तुमको याद किया करता
फ़ौज में जाना है उसको भी जब आओगे घर पापा
साड़ी कोई नई-नई सुंदर इस बार तो ले आना
माँ के हाथों मूँग मुगौड़ी तब खाओगे घर पापा
देश हमारा राष्ट्र हमारा हम सब इसके वासी हैं
यही सीखना है हम सबको आके सिखाओ घर पापा
के वी












