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यादों का सावन

बरस रहा है सावन रिमझिम, दिल में यादों की बरसात।
कहां गए बचपन के वो दिन, लौटा दो करती फरियाद।।

कितना सुहाना था बाबुल का घर, हरसू बिखरा था आनंद।
झूला होता आमवा की डाली, शीतल पुरवाई थी मंद।।

सारी सहेलियां संग खेला करती, संग संग झूला झूली।
बस मनमर्जी चलती थी अपनी, थे हम भी पंछी आज़ाद।।

अब वो सावन कहां रहा है, कब मैं वो सारी बातें भूली।
दिल करता है बाबुल घर जाऊं, मेरे दिल की यही मुराद।।

सावन अब भी बरस रहा है, पर बचपन की वो बात नहीं।
रात चांदनी होती है अब भी, लेकिन वो पूनम रात नहीं।।

वो बचपन है अब यादों में,ये आँखें बरस क्यों जाती हैं।
लौटा दो कोई गुजरा जमाना, ये दुनियां फिर हो आबाद।।

सोनी बरनवाल “कशिश”
जमुई, बिहार

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