
भारत माँ के आँचल में
राम-कृष्ण भी खेले हैं
इस धरती पर कहाँ क्या नहीं
वीरों के तो मेले हैं ।
देखो विपदा माँ पर आई
कहाँ हो वीर जवानों तुम ?
सीमा पर दुश्मन चढ़ आया
कहाँ हो ऐ मस्तानों तुम ?
जो माटी माथे से लगाया
उसकी आबरू पर खतरा
अब तो यह माटी माँगे
तेरे लहू का एक कतरा ।
शीश कटा लेना चाहे
पर शीश कभी न झुका देना
परिस्थिति चाहे जितनी विकट हो
रिपु को धूल चटा देना ।
सैनिक कहता अपनी माँ से
तेरी आज कसम खाऊँ
मुझे दे आशीर्वाद ऐ माते !
देश के काम मैं आ जाऊँ ।
जो देश के काम न आए
वह बेकार जवानी है
राष्ट्रप्रेम न जिसके अंदर
वह मर्द बेपानी है।
नागेन्द्र त्रिपाठी
गाजियाबाद / वाराणसी उत्तर प्रदेश













