
क्या यही आज़ादी चाहिए थी?
लोग खूब लिखेंगे कविताएँ स्वतंत्रता दिवस पर,
तिरंगे की शान लिखेंगे,
शहीदों की कुर्बानी लिखेंगे,
आज़ादी के गीत गाएँगे।
लेकिन एक सवाल कोई खुद से भी पूछे—
क्या यही आज़ादी चाहिए थी?
क्या आज़ादी का अर्थ यह था
कि हम किसी को भी गाली दें?
देश के प्रधानमंत्री को गाली दें,
उनकी माँ तक को अपमानित करें,
या किसी भी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की गरिमा को
अपने शब्दों से कुचल दें?
क्या आज़ादी का अर्थ यह था
कि देश के खिलाफ नारे लगाना
अपनी स्वतंत्रता समझ लिया जाए?
विपक्ष अपनी मर्यादा खोता जाए,
सत्ता अपनी जिम्मेदारी भूलती जाए,
समाज अपनी संवेदनशीलता खोता जाए,
और युवा अपनी समझ और विवेक।
फिर हम किस आज़ादी का उत्सव मना रहे हैं?
आज़ादी हमें बोलने का अधिकार देती है,
लेकिन किसी को अपमानित करने का अधिकार नहीं।
आज़ादी सवाल पूछने की ताकत देती है,
लेकिन देश को तोड़ने का अधिकार नहीं।
आज़ादी विरोध करने का हक देती है,
लेकिन नफ़रत फैलाने की छूट नहीं।
अगर हमारी आज़ादी का अर्थ
सिर्फ़ गाली देना,
अपमान करना,
नफ़रत फैलाना
और देश को बाँटने वाली आवाज़ों को सही ठहराना है—
तो फिर सच कहिए,
क्या यही आज़ादी हमारे शहीदों ने चाही थी?
अगर यही चाहिए था,
तो फिर ढकोसला बंद कर दीजिए।
हर साल तिरंगे पर कविता लिखना बंद कर दीजिए।
शहीदों के नाम पर शब्द सजाना बंद कर दीजिए।
क्योंकि तिरंगा सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं,
और आज़ादी सिर्फ़ एक शब्द नहीं।
यह उन लोगों की विरासत है
जिन्होंने अपने आज को कुर्बान करके
हमारा कल बनाया था।
इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस
सिर्फ़ यह मत पूछिए कि—
“हम आज़ाद हैं या नहीं?”
एक बार यह भी पूछिए—
“हमने अपनी आज़ादी के साथ किया क्या है?”
जय हिंद।
आर एस लॉस्टम













