Uncategorized
Trending

कलयुग में सद्कर्म

मेरे लिये मेरी आदतें ही नासुर हो गयीं
नफ़रत के बावजूद अहित किसी का ना कर पाना ही कसूर हो गई

पूरा जहान मेरा इसी कर्मों को भुनाता है
अपना हित ही सदैव मुझसे सधवाता है

कलयुग है कलयुगी ही ना बन पाये
वजह सदैव ही जमाने की ठोकर खाये

अपना अभिमान अपना सम्मान सब मिट्टी हो गया
ज़रिया हो गये हम जिस पर जमाना सारा नप गया

सारा जहाँ ही लालच में लुटेरा हो गया
बीमार मजबूरों को भी हवश के वशीभूत लील गया

अब उम्मीद इंसानियत की इंसानों से क्या करें जनाज़ा निकल गया
सतयुग का राक्षस ही आज का जीता जागता इंसान हो गया

सद्कर्मों का इस कलयुग में अब कोई मापदंड रहा नहीं
नैतिकता सारी पाप की गंगा में बह गई

इंसान अब हवश का पुजारी है वहशियानापन लालच ही उसकी पहचान है
क्या करें कैसे जियें इस विलासी दुनियाँ में बिकाऊ अब स्वयं भगवान है

अब हारकर दुनियाँ से घुटन भरे अंधेरे कमरे को ही अपना जहाँ बना लिया
अँधेरों के इस संसार में तन्हाई को ही अपना सच्चा मकाम बना लिया


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *