समर्पण- मेरी दीदी
सूनी राखी,,,
एक राखी एसी भी थी जब डाक से राखी नही आती थी
एक राखी ऐसी भी थी जब बहन तेरे इन्तीज़ार मे कम्बख्त आंखें भी नम हो जाती थी
ओर तुम हो कि बस इन्तीज़ार मे सिमट रह जाती थी
वक़्त भी क्या था हम कलाई देखकर मुस्कुराते थे
राखियों की संख्या पर ही इतराते थे
बहना की खुशी राखी बांधने की होती थी
ओर हम उन खुशियों पर ही अपना सर झुकाते थे
वो रुमाल देती मिठाई खिलाती
प्यार के आँसूओं से ही भाई की सलामती चाहती
भाई उसको प्यार देता क्या उपहार देता
जान से ज्यादा आत्मा भी बहन के आंसू पर वार देता
दिन थे तो राखी का त्यौहार था
सब सुख भी उसके आगे बेकार था
जो आज है वो ना कभी इन्तीज़ार था
बस रोली चावल से सजी वो बहना की थाली थी
ऐसा हमारा रक्षाबंधन का त्यौहार था
अब ना रोलि ना चावाल ना वो थाली
बहन तू ससुराल मे है ओर तेरे भाई की सूनी कलाई खाली
मेरी याद मे मन नही तोड़ना मेरी बहना
तू मेरी यादों मे है ओर यादों मे ही रहना
I love you मेरी बहना,,,,
संदीप सक्सेना
जबलपुर












