
कहने को तो साथ है, पर कहने भर का साथ
मत पूछो कटी कैसे, बिन साथ ही सारी रात!!
रात एक की बात नही, यह जीवन भर की बात,
कैसी जिद्द इक सांझ की, जो न आने देती रात!!
कहना करो यकीन मेरा, पर कैसे करे यह बात,
जब हर पल है टूट रहा आपस का विश्वास!!
सरल सरस की सांझ थी सरस गरल सी रात
चाँद तो था फलक रहा पर चाँदनी न थी साथ!!
ऐसे मे भी रात की, ठनी रही हर बात
कहती दिन उजास की उज्जवल नही कोई बात!!
दिन भी सुन था मौन रहा समझ रहा था बात
साथ रहे और यकीं न करे, समझ न आई बात!!
माना दुनियाँ रंगीन है और रंग भी भरे है साथ
पर उन रंगो का क्या फ़ायदा जब तस्वीर ही रहे न साफ!!
कोरी नही कोई कल्पना कोरी नही कोई बात
सच को सच है लिख रहा आज की ‘सरल’ यह बात!!
संदीप शर्मा सरल ।।
देहरादून उत्तराखंड ।।













