
नज़र जब चाँद पर ठहरी, दिखाई दाग़ भी उसमें।
मगर उजियारा देता है, बसा आकाश के उर में।।
मिलते निष्कलंक कहाँ, धरा पर या गगन भर में।
छिपे अवगुण सभी के ही, कहीं बाहर कहीं मन में।।
नहीं दाग़ों से घटता है, कभी सम्मान जीवन का।
सदा ऊँचा वही होता, रखा जिसने चरण रण का।।
कठिन संघर्ष की रेखा, सदा माथे सजाती है।
तपस के बाद ही प्रतिभा, नया सूरज उगाती है।।
निरंतर ज्योति बरसाकर, निशा का तम मिटाता है।
लिए दाग़ों को भी चंदा, सभी के मन में भाता है।।
अगर कमियाँ दिखाई दें, नहीं हिम्मत कभी हारो।
उन्हें आधार कर आगे, सफलता के शिखर पालो।।
बनो तुम चाँद से उज्ज्वल, भले कुछ दाग़ रह जाएँ।
मगर सत्कर्म की किरणें, सदा जग में चमक लाएँ।।
देता संदेश है चंदा, नहीं अवगुण से डरना है।
लिए दाग़ों को भी हँसकर, निरंतर बढ़ते रहना है।।
पूर्णिमा सुमन













