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छू कर नहीं देखा

आँखों में ही रहा वो दिल में उतरा नहीं,
कश्ती में बैठा पर समंदर को देखा नहीं।
पत्थर कहता रहा मुझे वो दीवाना मेरा,
मैं मोम था, उसने कभी छूकर देखा नहीं।

बातों में ही रहा, कभी समझा नहीं,
भीड़ में था मगर मेरा चेहरा देखा नहीं।
आईना कहता रहा सच है वो मेरा,
मैं दर्द में था, उसने पलट कर देखा नहीं।

उसकी खुशी के लिए खुद को लुटा दिया,
पर मेरी आँखों में आँसू देखा नहीं।
मैं तो जलता रहा उसकी राह में दिया बनकर,
उसने कभी जल कर भी मुझे देखा नहीं।

ख्वाबों में उसको खुदा बना रखा था,
उसने कभी मेरे ख्वाबों को देखा नहीं।
मैं तो हर ग़ज़ल में उसी को लिखता रहा,
उसने मेरी ग़ज़लों में खुद को देखा नहीं।

अब तो पत्थर भी पिघलने लगे हैं,
पर वो आज भी मुझे पिघला नहीं।
मैं तो कब का मिट चुका हूँ उसकी चाह में,
उसने मिट कर भी मुझको देखा नहीं।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र

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