
सावन की बुँदे जब आती, धरती की प्यास बुझाती है।
मानो इन बूंदो से, हरियाली सी छा जाती है।
सावन की बूंदो से मानों, फूलों की बगिया खिल जाती है।
सूखे घास, पात, डाली को जैसे यौवनता सी मिल जाती है।
सावन की बुँदे पड़ते ही,
झूले भी लग जाते हैं।
इन झूलों में बैठ कृष्ण जी,
मनभावन मुरली बजाते हैं।
इस मुरली की धुन में देखो,
राधा भी खो जाती हैं।
टकटकी लगाए चातक भी करता है देखो, इन बूंदों का इंतजार।
स्वाति नक्षत्र की सावन की बूंदों से ही, बुझती है इसकी प्यास।
सावन की बूंदों ने मानों इस धरती को, हरी चुनरिया ओढ़ा दी।
हमें भी सराबोर कर दिया, और हरियाली लौटा दी।
पूर्णपावन कृति
सरायपाली छत्तीसगढ़













