
‘कृष्ण मन’
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द्वार पर भीगे नयन हैं
अश्रु से गीले बयन हैं
इस विदा का भार लेकर जा रहा हूँ
ताल पर लय के थिरकती
मोरनी हर गोपिका थी
चंदनी सोलह कलाएँ
वह शरद की पूर्णिमा थी
दूध में केसर घुला था
रूप दर्पण सा खिला था
पर विरह भिनसार लेकर जा रहा हूँ
स्वाँग जितने भी धरे थे
रास रचने के लिए थे
राधिके तुम ही कहो अब
क्या कभी तुम बिन जिए थे
क्रूरता अक्रूर की थी
कर्म के दस्तूर की थी
वेदना घनसार लेकर जा रहा हूँ
अब न जाने किस जनम में
गोपियों तुमसे मिलन हो
याद मुझको है नहीं वो
पल कि जब मूँदे नयन हो
आज मन यमुना का जल है
तिर रहा गोकुल विकल है
टूटती पतवार लेकर जा रहा हूँ
‘राधा मन’
कृष्ण
लौटा दो मेरा मन
प्राण तन से खींच कर तो जा रहे हो
एक मैं थी एक तुम थे
एक पागल बाँसुरी थी
नोच डाली क्यों तुम्हीं ने
नेह की वह पाँखुरी थी
धूल में खंडित प्रणय है
अश्रु विगलित जीत लेकर जा रहे हो
अष्टदल में घूमता था
रास मंडल जब हमारा
योगमाया भी न समझी
मन कहाँ अटका तुम्हारा
बिम्ब सब टूटे शगुन के
एक गहरी टीस देकर जा रहे हो
धार यमुना की विकल है
तरु क़दम का भी मलिन है
अधमरे सब गोप ग़्वाले
श्वाँस में लंका दहन है
बाँह निर्बल की छुड़ा कर
प्रीति की परतीति लेकर जा रहे हो
थी कभी आरूढ़ रथ पर
मैं तुम्हारे साथ नभ में
आज बर्छी सी नुकीली
फाँस बाक़ी है ह्रदय में
क्योंकि उद्धव के लिए तुम
प्रेम का घट रीत करके जा रहे हो
के वी













