
जीवन की इस आपाधापी में
अंतिम साँसे ही गिनना बाक़ी है
इस जीवन के तीन प्रहर बीते,
अब आख़िरी प्रहर ही बाक़ी है,
जीवन की इस आपाधापी में,
अंतिम साँसे गिनना ही बाक़ी है।
बचपन, यौवन, गृहस्थ जीवन,
संन्यास ये चार आश्रम जीवन के,
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष,
ये चार पुरुषार्थ हैं जीवन के।
इस जीवन की जरूरतों को
कोई कितना भी पूरी कर ले,
यह जिंदगी पूरी हो जाएगी,
जरूरतें पूरी नहीं हो पायेंगी।
मानव जीवन प्रभु की माया,
उसने ही दिया आत्मा, काया,
उसका दिया उसको ही जाना,
ऐ हृदय बता तू क्यों भरमाया।
सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग
चारों युग आते हैं जीवन में,
आदित्य स्वर्ग, नर्क, दुख-सुख,
मिलते जाते हैं मानव जीवन में।
डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













