
चेहरे पर नक़ाब आज भी रहते हैं उनके,
और हम समझते रहे कि चाँद-सा मुखड़ा होगा।
हक़ीक़त से रूबरू हुए तो जाना हमने,
जिसे अपना समझा था, वो भी कोई और होगा।
मुस्कुराहट में छुपे थे कितने राज़ उनके,
हमने तो हर दर्द को उनका अदा समझा था।
वक़्त ने जब आईना सामने रख दिया,
तब जाना—चेहरा नहीं, किरदार पढ़ना होगा।
बड़े ही कलाकार हैं महबूब मेरे,
हक़ीक़त नहीं, किरदार को जीते हैं।
हर अदा में छुपा लेते हैं अपना सच,
हम तो उनकी मुस्कान को ही सच्चाई समझते हैं।
कमाल का हुनर है उनके फ़रेब में भी,
हर बार हम उन्हें अपना समझकर हारते हैं।
अब न चेहरों पर भरोसा है, न बातों पर,
हमने तो लोगों को रंग बदलते देखा है।
जो सामने था, वो अपना न था कभी,
हमने बस अपने दिल से उसे अपना समझा है।
— R. S. Lostom













