
महफ़िल में मेरे नाम की बात चल रही थी,
मेरे ही अपने मेरे खिलाफ चल रहे थे।
मैं आ गया सामने तो चेहरे बदल गए,
हंस कर बोले बड़ी लम्बी उम्र है तुम्हारी।
जिन्हें दिल में रखा वही दूर हो रहे थे,
मेरी हंसी के पीछे वार कर रहे थे।
मेरी खामोशी से भी डर रहे थे,
फिर भी बोले बड़ी लम्बी उम्र है तुम्हारी।
मैं टूटा नहीं बस चुप हो गया था,
भीड़ से थोड़ा अलग हो गया था।
मेरा लौटना उन्हें खल गया था,
इसलिए बोले बड़ी लम्बी उम्र है तुम्हारी।
फिर मैंने सब कान्हा पर छोड़ दिया।
अपना हर हिसाब उससे जोड़ लिया,
उसने मेरी महफ़िल ही बदल दी,
जहाँ साजिश थी वहाँ बंसी बजा दी।
अब उसी महफ़िल में रास रच रहा है,
हर दिल में कान्हा बस रहा है।
जो कल तक खिलाफ थे वही आज कह रहे हैं,
जय कन्हैया लाल की, बड़ी लम्बी उम्र है तुम्हारी।
मैंने सीखा है वक्त सब सिखा देता है,
कौन अपना है ये बता देता है।
भीड़ में भी जो साथ खड़ा है,
वही तो सच्चा अपना है।
अब न शिकवा है न कोई गिला है,
कान्हा के नाम से दिल खिला हैं।
जो जलते थे अब वही कहते हैं,
यार तेरी तो बड़ी लम्बी उम्र है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला “अमन” सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र













