
जो मेरे पास आना नहीं चाहता,
मैं भी उसको बुलाना नहीं चाहता।
जिसे एहसास ही नहीं मेरी चाहत का,
मैं उसे दिल में बसाना नहीं चाहता।
बहुत रिश्ते निभाए हैं मैंने लेकिन,
हर एक रिश्ता निभाना नहीं चाहता।
जो ख़ुद ही फ़ासले रखना पसंद करे,
मैं उसके क़रीब जाना नहीं चाहता।
जिसे मेरी ख़ामोशी समझ न आए,
मैं उसको कुछ समझाना नहीं चाहता।
वो चाहे भूल जाए मेरी वफ़ाओं को,
मैं उसको फिर याद दिलाना नहीं चाहता।
जिसे ठुकराने में सुकून मिलता हो,
मैं उसे अपना बनाना नहीं चाहता।
बहुत आसान है कहना कि लौट आओ,
मगर दिल को मैं बहलाना नहीं चाहता।
जो मेरे दर्द का कारण बन चुका है,
मैं उससे दर्द छिपाना नहीं चाहता।
जिसे परवाह नहीं मेरी तन्हाई की,
मैं उसके आगे आँसू बहाना नहीं चाहता।
मैंने सीखा है वक्त की ठोकरों से,
हर किसी से दिल लगाना नहीं चाहता।
जो बदल गया है अपनी राह लेकर,
मैं उसे फिर से बुलाना नहीं चाहता।
मेरी गैरत मुझे रोकती है अक्सर,
मैं किसी के आगे झुकना नहीं चाहता।
अगर रिश्ते में सिर्फ़ मैं ही रहूँ,
ऐसा रिश्ता मैं निभाना नहीं चाहता।
जिसे जाना है, उसको राह मुबारक,
मैं किसी को रोकना नहीं चाहता।
वो मेरे बिन खुश है तो खुश ही रहे,
मैं उसकी खुशी चुराना नहीं चाहता।
मेरे हिस्से में जो भी आया है अब तक,
मैं उसे व्यर्थ गँवाना नहीं चाहता।
दिल ने समझा लिया है ख़ुद को आख़िर,
हर किसी को अपना बनाना नहीं चाहता।
अब तो अकेले भी जी लूँगा हँसकर,
मैं किसी का सहारा पाना नहीं चाहता।
मक़्ता
‘राठौर’ अब ख़ुदी से जीना सीख कर,
हर किसी को अपना बताना नहीं चाहता।
स्वरचित एवं मौलिक धर्मेंद्र कुमार राठौर व्याख्याता भौतिक विज्ञान
झालावाड़ राजस्थान













