
चेहरे पर परतें बहुत हैं,
अनजाने रास्ते बहुत हैं,
हर मुस्कान के पीछे छुपे
दर्द के वास्ते बहुत हैं।
मुस्कान का मुखौटा पहन
हर दर्द को बहलाया जाता है,
कुछ पल के लिए ही सही,
ज़िंदगी को गुमराह किया जाता है।
किसे पढ़ें, किसे समझें हम,
हर शख़्स में राज़ बहुत हैं,
कुछ अपने होकर दूर खड़े,
कुछ गैर भी साथ चले हैं।
कितना भी हो मन का सच्चा,
कभी हँसकर, कभी रोकर,
दुनिया के रंग में ढलने को
इंसान बदल लेता है चेहरा अक्सर।
खुद को खोजने निकले हैं हम,
आईने में सवाल बहुत हैं,
एक चेहरा दुनिया के लिए,
अंदर कई किरदार बहुत हैं।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













