Uncategorized
Trending

पुस्तक की अभिलाषा


विधा : पद्य
मैं हूॅं एक हिंद का पुस्तक ,
मैं तो हिंदी का प्यासा हूॅं ।
मुझमें यह साहित्य हिंदी ,
मैं हिंद का अभिलाषा हूॅं ।।
जैसा हिंद सागर विराट ,
वैसा ही हिंद का हिंदी हूॅं ।
नारी ललाट जो है चढ़ता ,
वह सम्मानित मैं बिंदी हूॅं ।।
सागर भरा गागर बनूॅं मैं ,
हिंद राष्ट्र का पागर बनूॅं मैं ।
पुस्तक की अभिलाषा यही ,
हिंद देश का नागर बनूॅं मैं ।।
पद है पखारता हिंद सागर ,
ताज पहने खड़ा हिमालय ।
हिंदी हिंद का स्वयं हृदय है ,
देता है ज्ञान का सुंदर लय ।।
पुस्तक का अभिलाषा हिंदी ,
लेना चाहे दिलासा है हिंदी ।
दुश्मन होता वह है हिंद का ,
पुस्तक का भी प्यासा हिंदी ।।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण ) ,
बिहार ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *