
जो ग़म में डूब गए, उन्हें हँसाना पड़ता है,
जो तन्हा रह गए, उन्हें महफ़िल में लाना पड़ता है।
हम कवियों का कुनबा भी कितना निराला है,
जहाँ मायूसी हो, वहाँ भी रंग जमाना पड़ता है।
हम लफ़्ज़ों से दिल के ज़ख्मों को सिलते हैं,
और बिखरे लम्हों को नज़्म में पिरोते हैं।
हम तो फकीर हैं बस अल्फ़ाज़ों के,
हर दर्द को भी गीत बनाना पड़ता है।
न हमें ताज चाहिए, न तख़्त चाहिए,
बस एक सच्चा दिल चाहिए।
जहाँ सच हो, वहाँ हम ठहर जाते हैं,
झूठ हो तो किनारा करना पड़ता है।
ये शायरी नहीं, ये इबादत है हमारी,
सच कहने के लिए ज़हर भी पीना पड़ता है।
तालियों की भूख नहीं है हमें,
बस दिलों में घर बनाना पड़ता है।
और जब हम इस महफ़िल से उठते हैं,
तो पीछे एक नया ज़माना छोड़ जाते हैं।
लोग कहते हैं फिर धीरे से –
आए थे तो महफ़िल में जान आई थी।”
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र












