
उम्मीदों का कोई शहर ढूँढते हैं,
अमन चैन से हो बसर ढूँढते हैं।
जो उड़ने का दे हौसला आसमाँ तक,
परिंदों का दम, जोश,पर ढूँढते हैं।
बड़ी ग़मज़दा है ग़ज़ल की रवायत,
कोई ख़ुशनुमा सी बहर ढूँढते हैं।
बहुत पुरसकूँ नींद दे ज़िंदगी को,
उसी साँप का हम ज़हर ढूँढते हैं।
मेरी दोस्ती की हो जद दुश्मनों तक,
वो लफ्जों में ऐसा असर ढूँढते हैं।
ठिकाना मिले आबो दाना मिले भी,
किसी ऐसी बस्ती में घर ढूँढते हैं।
नज़ारों में खिलते थे रंगीन गुलशन,
वो हाथों से फिसली उमर ढूँढते हैं।
मिटा अपनी हस्ती सिकंदर भी भागे,
सियासत में ऐसा क़हर ढूँढते है।
कोई फ़ैज अहमद अदम हो या ग़ालिब,
कलम में हम ऐसा हुनर ढूँढते हैं।
जहाँ हो न कोई भी बंदिश लबों पर,
वही कारवाँ वो सफ़र ढूँढते हैं।
के वी













