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माता दुर्गा का प्रथम रूप ‘ शैलपुत्री ‘ का है ।

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या देवी सर्व भूतेषु प्रकृति रुपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमो नम: ।

माता दुर्गा का प्रथम रूप ‘ शैलपुत्री ‘ का है ।
पर्वत राज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये ‘शैलपुत्री ‘ हैं ।
प्रथम नवरात्र के दिन कलश स्थापना के साथ ही इन की पूजा एवं अराधना का विधान है।

शैलपुत्री के पूजन से ‘मूलाधार-चक्र ‘
जागृत होता है । योगसाधना का आरम्भ यहीं से होता है । इसी से अनेक शक्तियों की प्राप्ति होती है ।

यह आरती शैलपुत्री महामाई के चरणों में अर्पित है—- अनन्य भक्त महेश शर्मा
. . . . . . .

हे माते ! स्वीकार करो !

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
।। आरती शैलपुत्री महमाई की ।।

जय-जय-जय शैलपुत्री की अनुकम्पा हम पावें ।।

तेरे प्रताप समक्ष दुष्ट असुरों का जिया घबरावे ।।

जय-जय-जय – – –

हिमराज हिमालय की पुत्री तूं ही उमा कहलावे ।।

जय-जय-जय – – – –

दक्षिण हस्त में महाकाल का त्रिशूल लहरावे।।

जय-जय-जय – – – –

वाम हस्त में मानसरोवर का अम्बुज शोभा पावे।।

जय-जय-जय – – – – –

जीवन में आई शत्रु बाधा और क्लेश मिट जावे ।।

जय-जय- जय – – – –

सौभाग्य वरद् हस्त है तेरा, तूंही शक्ति कहलावे।।

जय-जय-जय – – – –

आई अस्थिरता जीवन में, दु:ख-दर्द मिट जावे ।।

जय-जय-जय – – – –

जो करे स्तुति तेरी वो जीवनपर्यन्त न दुःख पावे।।

जय-जय-जय – – – –

कष्ट सहे अनेक मन लक्षित, तनिक नहीं घबरावे।

जय-जय-जय – – – –

सहस्रों वर्ष कठोर तपस्या से शिवानी तूं कहलावे ।

जय-जय-जय – – – –

हे शैलपुत्री महामाई ! शुभ्र वृषभ वाहन बन आवे ।

जय-जय-जय – – – –

शक्ति धारे तूं अनन्त ,भक्तजन समझ नहीं पावे।।

जय-जय-जय- – – –

भक्त जन पर शीघ्र कृपा कर तूं शीतलता बरसावे।।

जय-जय-जय – – – –

दु:ख , दरिद्रता याचक की समूल मिट जावे ।।

तेरे द्वार खड़े ब्रह्मा- विष्ण-ु महेश तेरे गुण गावें।।

जय-जय-जय – – – –

हे मां ! तेरी शरणागत है,तेरा अनुचर – ‘महेश ‘।।

जय-जय-जय- –

— महेश शर्मा, करनाल

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