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या देवी सर्व भूतेषु प्रकृति रुपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमो नम: ।
माता दुर्गा का प्रथम रूप ‘ शैलपुत्री ‘ का है ।
पर्वत राज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये ‘शैलपुत्री ‘ हैं ।
प्रथम नवरात्र के दिन कलश स्थापना के साथ ही इन की पूजा एवं अराधना का विधान है।
शैलपुत्री के पूजन से ‘मूलाधार-चक्र ‘
जागृत होता है । योगसाधना का आरम्भ यहीं से होता है । इसी से अनेक शक्तियों की प्राप्ति होती है ।
यह आरती शैलपुत्री महामाई के चरणों में अर्पित है—- अनन्य भक्त महेश शर्मा
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हे माते ! स्वीकार करो !
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।। आरती शैलपुत्री महमाई की ।।
जय-जय-जय शैलपुत्री की अनुकम्पा हम पावें ।।
तेरे प्रताप समक्ष दुष्ट असुरों का जिया घबरावे ।।
जय-जय-जय – – –
हिमराज हिमालय की पुत्री तूं ही उमा कहलावे ।।
जय-जय-जय – – – –
दक्षिण हस्त में महाकाल का त्रिशूल लहरावे।।
जय-जय-जय – – – –
वाम हस्त में मानसरोवर का अम्बुज शोभा पावे।।
जय-जय-जय – – – – –
जीवन में आई शत्रु बाधा और क्लेश मिट जावे ।।
जय-जय- जय – – – –
सौभाग्य वरद् हस्त है तेरा, तूंही शक्ति कहलावे।।
जय-जय-जय – – – –
आई अस्थिरता जीवन में, दु:ख-दर्द मिट जावे ।।
जय-जय-जय – – – –
जो करे स्तुति तेरी वो जीवनपर्यन्त न दुःख पावे।।
जय-जय-जय – – – –
कष्ट सहे अनेक मन लक्षित, तनिक नहीं घबरावे।
जय-जय-जय – – – –
सहस्रों वर्ष कठोर तपस्या से शिवानी तूं कहलावे ।
जय-जय-जय – – – –
हे शैलपुत्री महामाई ! शुभ्र वृषभ वाहन बन आवे ।
जय-जय-जय – – – –
शक्ति धारे तूं अनन्त ,भक्तजन समझ नहीं पावे।।
जय-जय-जय- – – –
भक्त जन पर शीघ्र कृपा कर तूं शीतलता बरसावे।।
जय-जय-जय – – – –
दु:ख , दरिद्रता याचक की समूल मिट जावे ।।
तेरे द्वार खड़े ब्रह्मा- विष्ण-ु महेश तेरे गुण गावें।।
जय-जय-जय – – – –
हे मां ! तेरी शरणागत है,तेरा अनुचर – ‘महेश ‘।।
जय-जय-जय- –
— महेश शर्मा, करनाल












