
कविता
श्री कृष्ण जी के सर पर मयूर पंख का ताज हो,
मोर मुकुट बंसी वाले की मधुर मुरली की साज हो,
तान सुनाएं मुरली मनोहर कृष्ण, नृत्य करे गोपियां संग संग मोर है ,
जो देखे पांव के रंग कुरुप में
आंखों से पानी टपकता है मोर के,
मोर मुकुट पहनतीं जुड़े की घटाएं,
सुख का धाम सुंदर मोर पंख,
मयूर पंख शोभा की खान छटाएं ,
मधुवन में राधिका नाचे रे,
मोहन की मुरली बाजे रे,
संग संग मोर सुन्दर सुन्दर नृत्य में लीन हो जाते है ,
जो पांव के कू रूप को देख लिया तो,
आंखों में आंसू भर कर बोला,
कौन मुझे पहचानेगा,
है कृष्ण मुझ पर उपकार करो,
बोले श्री कृष्ण जी
आज से मोर मुकुट बंसी वाले नाम से
मुझे भी पहचानेगा,
श्री कृष्ण ने बड़ा हि उपकार किया,
एक सच्चे सखा सा व्यवहार किया।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)












