
मिरे दिल में कोई पुराना मर्ज़ पलता रहा,
तेरा नाम लबों पर दवा बनकर चलता रहा।
मैंने चाहा कि तुझको भुला दूँ किसी तरह,
मगर हर ज़ख़्म तेरा नाम लेकर मचलता रहा।
न कोई चारागर समझा, न समझी ये दुनिया,
मेरा दर्द मेरी रूह में चुपचाप पलता रहा।
तेरी यादों की तपिश कम न हो सकी कभी,
मैं मोम की तरह तेरी चाहत में गलता रहा।
कभी अश्कों ने लिखी दास्ताँ मेरी आँखों पर,
कभी ख़ामोशियों में दर्द मेरा ढलता रहा।
मैंने हर बार छुपाया तिरे जाने का ग़म,
मगर चेहरा मिरे दिल का फ़साना कहता रहा।
न जाने कौन-सी बीमारी-ए-इश्क़ थी मुझको,
कि जितना दर्द बढ़ा, दिल उतना सँभलता रहा।
मैंने हर ज़ख़्म को तेरी अमानत मान लिया,
और तू था कि मिरी रूह से निकलता रहा।
कोई दवा भी भला इश्क़ का क्या इलाज करे,
ये मर्ज़ तेरी निगाहों से ही मचलता रहा।
धर्मेंद्र, इश्क़ में इतना भी कमाल हुआ,
वो दूर होता गया, दिल उसी का होता रहा।
धर्मेंद्र कुमार राठौर (कलमकार)
व्याख्याता भौतिक विज्ञान झालावाड़ राजस्थान












