
असत्य आश्रय के बल मिला लक्ष्य
ऐसे लक्ष्य को पा कर
मिले कटु फल… न तृप्ति मिले … मिले भक्ष्य-अभक्ष्य
हर प्रहर डूब गया आत्म-वंचना …. काहे की संरचना
दुरात्मा सत् कर्म का ढोंग करे…ये घातक, ये है प्रवंचना
आत्मा को लेते है छल
बीज मिलेंगे पर न उगें
काहे की आशा… काहे के सुफल ।
नफरत की खेती
आत्मा और सत्कर्मों को है डस लेती
सदा ही परिणाम मिले … कंटिले फल है देती
फल लगे न लगें
उगी झाड़ियों में सुप्त मकड़ जाल की वंचना
जीवों के प्राण हर लेती
सत्य का अनुपालन… आज नहीं तो कल
सद् नियति की शक्ति ..वसुधैव कुटुम्बकम-सा
आनंद है सेती।
अनादि शक्ति … रूप प्रकृति
कोई नहीं पराया … जल-वायु-आकाश-धरा
इस जग में.. सदैव प्रकाश हरा-भरा
सदा निरंतर रूप न बदले… चहुं दिस प्रेमोपहार
जगती को मिले सुगंध भरा ।
महेश शर्मा - करनाल













