
किसने बनाये यह मुखौटे?
असली चेहरे पीछे छिपाते
सामने आते खोटे!
महत्वाकांक्षाएं जब करती हैं हद पार,
उनकी पूर्ति हेतु मनुष्य तब
करता व्यभिचार।
यह भी सोचता है,
दुनिया की नजरों में ना दिखूं छोटा,
लो जी लो, तैयार है मुखौटा।
थोड़ी ऊंची ऊंची बातें,थोड़ा अभिनय,
रखो थोड़ा सौम्य चेहरा, मुस्कुराहट किसलय।
ना पहचानेगा कोई, लोगों को भड़काओ,
लच्छेदार बातों से उनको भिड़ाओ।
जम के कोसो प्रतिद्वंदियों को,
गलती उनकी दिखाओ।
तुम्हारे करने को कुछ नहीं बचा,
यह उनको समझाओ।
कुछ भी होले, इतना देखो,
घर अपना भर पाओ।
जाओ, जाकर सुंदर से
दो चार मुखौटे ले आओ।
वक्ते ज़रूरत इनका बदलो,
दुनिया में तब सुयश पाओ।
सुलेखा चटर्जी













