
करवा का व्रत मैं करूं,
हर दुखों से तुम्हें दूर रखूं।
खुशियों की बौछारें भरूं,
पिया सदा संग तेरे रहूं।
करवा चौथ का व्रत मैं करूं,
सोलह शृंगार से सजी मैं रहूं।
स्नेह, आयु तेरे लिए मैं मांगू,
चलनी से मैं चांद को देखूं।
प्रेम-उमंग से पिया तुझे देखूं,
तेरे हाथ से निर्जला व्रत मैं तोडूं।
विश्वास, श्रद्धा से आनंद भरूं,
सौभाग्य से मैं सजी रहूं।
प्रीत से सातों जन्म तेरे संग रहूं,
मुसीबतों से तुझे मैं बचाऊं।
आए ऐसी घड़ी हर साल,
साथ में हम दोनों का हो हाथ।
करवा माता को करती मैं प्रणाम,
श्रद्धा-सुमन से पिया तेरे मैं साथ।
कवियित्री दुर्वा दुर्गेश वारीक ‘गोदावरी’ (गोवा)













