
संवेदनाओं के परिष्कृत रूप में,
अतीत का उभरता मसला,
पुराने घावों को फिर कुरेद गया,
वादों की अधूरी झलक
हर पल मुझे जगा गया।
काले-सफेद समय ने
मुझे लपेटा अधूरे सच में,
ज्ञान की नुकीली किरचें
कण-कण बनकर जल गईं मन में।
फिर मैं पलता रहा भविष्य के भ्रम में,
अंधियारे में उलझा था
वक़्त के अनजाने ज़ख्मों से,
और भीतर —
अदद सा कोई रंग भर गया।
कुछ रातें ग़ुज़र गईं,
नींद आँखों में उतरी नहीं,
कहीं सपना था, कहीं हकीकत नहीं —
अतीत की चुड़ैलें
मुझे फिर चुभा गईं।
रूपेश सिंह लॉस्टम













